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कहानी कोतवाल धन सिंह की:1857 की क्रांति… ब्रिटिश हुकूमत पर भारी पड़ा था अकेला कोतवाल, बीच चौराहे पर दी गई थी फांसी
कहानी कोतवाल धन सिंह की:1857 की क्रांति... ब्रिटिश हुकूमत पर भारी पड़ा था अकेला कोतवाल, बीच चौराहे पर दी गई थी फांसी

1857 की क्रांति के नायक, कोतवाल धनसिंह गुर्जर, जिनकी ललकार से ब्रिटिश हुकूमत कांप उठी थी. मेरठ के विक्टोरिया पार्क जेल पर हमला कर उन्होंने न केवल 800 से ज्यादा क्रांतिकारियों को आजाद कराया, बल्कि ब्रिटिश शासकों को भी घुटनों पर ला दिया था.
मेरठ: मेरठ को क्रांति की धरती यूं ही नहीं कहा जाता. ये वह वीरभूमि है जहां से 10 मई 1857 को देश की आजादी की पहली लड़ाई का बिगुल फूंका गया था. इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ के सिपाही, पुलिस और आम लोग एकजुट होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़े हुए थे. इस आंदोलन की अगुवाई की थी सदर थाने में तैनात कोतवाल धनसिंह गुर्जर ने जिन्हें “कोतवाल धन सिंह” के नाम से भी जाना जाता है. लोकल-18 की टीम ने स्वतंत्रता सेनानी धनसिंह कोतवाल के प्रपौत्र तस्वीर सिंह चपराना से खास बातचीत की और उनके परिवार के उस इतिहास को जाना, जो आज भी देशभक्ति की मिसाल बना हुआ है.
गांव-गांव जाकर किया था क्रांति का आह्वान
तस्वीर सिंह चपराना बताते हैं कि उनके परदादा धनसिंह कोतवाल ब्रिटिश शासन के दौरान सदर थाने में कोतवाल थे- जो उस समय किसी भारतीय के लिए सबसे बड़ा पुलिस पद हुआ करता था. जब उन्हें यह जानकारी मिली कि 85 भारतीय सैनिकों को कोर्ट मार्शल कर विक्टोरिया पार्क स्थित जेल में बंद कर दिया गया है, तो उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया. धनसिंह कोतवाल की पुकार पर बड़ी संख्या में ग्रामीण उनके साथ जुड़ गए. इसके बाद मेरठ की विक्टोरिया पार्क जेल पर हमला कर 85 भारतीय सैनिकों समेत कुल 839 क्रांतिकारियों को छुड़ाया गया. इस दौरान कई अंग्रेज अधिकारियों को भी मौत के घाट उतार दिया गया और फिर ये सभी क्रांतिकारी दिल्ली की ओर कूच कर गए.
तस्वीर सिंह चपराना बताते हैं कि उनके परदादा धनसिंह कोतवाल ब्रिटिश शासन के दौरान सदर थाने में कोतवाल थे- जो उस समय किसी भारतीय के लिए सबसे बड़ा पुलिस पद हुआ करता था. जब उन्हें यह जानकारी मिली कि 85 भारतीय सैनिकों को कोर्ट मार्शल कर विक्टोरिया पार्क स्थित जेल में बंद कर दिया गया है, तो उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया. धनसिंह कोतवाल की पुकार पर बड़ी संख्या में ग्रामीण उनके साथ जुड़ गए. इसके बाद मेरठ की विक्टोरिया पार्क जेल पर हमला कर 85 भारतीय सैनिकों समेत कुल 839 क्रांतिकारियों को छुड़ाया गया. इस दौरान कई अंग्रेज अधिकारियों को भी मौत के घाट उतार दिया गया और फिर ये सभी क्रांतिकारी दिल्ली की ओर कूच कर गए.
अंग्रेजों ने गांव पर बोला तोप से हमला
तस्वीर चपराना बताते हैं कि इस विद्रोह से बौखलाए अंग्रेजों ने एक जांच कमेटी गठित की. कमेटी की रिपोर्ट में धनसिंह कोतवाल के गांव पांचली खुर्द का पूरा ब्यौरा दिया गया. रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजों ने पहली बार किसी गांव पर तोप से हमला बोला. अंग्रेजी सेना ने गांव के उन सभी युवाओं को निशाना बनाया, जो भविष्य में विद्रोह कर सकते थे. उन्हें तोप से उड़ा दिया गया. आसपास के दूसरे गांवों में भी क्रांतिकारियों पर ज़ुल्म ढाए गए, लेकिन क्रांति की चिंगारी अब रुकने वाली नहीं थी. यही चिंगारी आगे चलकर 1947 में देश को आज़ादी दिलाने की वजह बनी.
तस्वीर चपराना बताते हैं कि इस विद्रोह से बौखलाए अंग्रेजों ने एक जांच कमेटी गठित की. कमेटी की रिपोर्ट में धनसिंह कोतवाल के गांव पांचली खुर्द का पूरा ब्यौरा दिया गया. रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजों ने पहली बार किसी गांव पर तोप से हमला बोला. अंग्रेजी सेना ने गांव के उन सभी युवाओं को निशाना बनाया, जो भविष्य में विद्रोह कर सकते थे. उन्हें तोप से उड़ा दिया गया. आसपास के दूसरे गांवों में भी क्रांतिकारियों पर ज़ुल्म ढाए गए, लेकिन क्रांति की चिंगारी अब रुकने वाली नहीं थी. यही चिंगारी आगे चलकर 1947 में देश को आज़ादी दिलाने की वजह बनी.
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